अपने भारत-बोध के लिए पहले खुद जागना होगा : पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ

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हरिऔध कला भवन में गूंजा राष्ट्रचेतना का संदेश, रांगेय राघव के साहित्य में राष्ट्रजागरण की चेतना पर हुआ मंथन

महाराजा सुहेल देव विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय संगोष्ठी में भारतीय सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान परंपरा और युवा शक्ति की भूमिका पर वक्ताओं ने रखे विचार

हिंदी न्यूज़ 24
आजमगढ़। “हमें किसी और को जगाने से पहले स्वयं जागना होगा—अपने भारत, अपनी सभ्यता और अपनी ज्ञान परंपरा के लिए।” वरिष्ठ पत्रकार एवं मुख्य वक्ता पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ के इस आह्वान के साथ शनिवार को हरिऔध कला भवन राष्ट्रचेतना और भारतीय सांस्कृतिक विरासत के विमर्श का केंद्र बन गया। महाराजा सुहेल देव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ के तत्वावधान में रांगेय राघव शोधपीठ की ओर से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘जाग उठ मेरे हिंदुस्तान’ के मुख्य सार्वजनिक सत्र में भारतीय सभ्यता, सांस्कृतिक चेतना, साहित्य और युवा शक्ति की भूमिका पर गंभीर मंथन हुआ।

भारत की पहचान हजारों वर्षों की सभ्यता से
मुख्य वक्ता पुष्पेंद्र कुलश्रेष्ठ ने कहा कि भारत को केवल 15 अगस्त 1947 से शुरू हुई राजनीतिक इकाई के रूप में देखना उसकी हजारों वर्षों की सभ्यतागत निरंतरता को सीमित करना है। भारत की अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा, ज्ञान-दृष्टि और जीवन-मूल्य रहे हैं। युवाओं को अपनी जड़ों, इतिहास और महापुरुषों को केवल पाठ्यक्रम का हिस्सा मानने के बजाय उनके विचारों और योगदान को समझना चाहिए तथा उन्हें वर्तमान जीवन में आत्मसात करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता किसी दूसरे व्यक्ति या समाज को जगाने से पहले स्वयं के भीतर राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक जिम्मेदारी जगाने की है। जातिगत विभाजन से ऊपर उठकर कर्म, योग्यता और सामाजिक एकता को महत्व देने की जरूरत है। डॉ. भीमराव आंबेडकर का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि महापुरुषों को उनकी जातिगत पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि उनके विचारों और राष्ट्र व समाज के लिए किए गए योगदान के आधार पर समझना चाहिए।

रांगेय राघव के साहित्य में दिखता है राष्ट्रजागरण का स्वर
शोधपीठ के प्रभारी प्रो. सुजीत कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि रांगेय राघव असाधारण प्रतिभा के साहित्यकार थे। उन्होंने 150 से अधिक पुस्तकों की रचना की और साहित्य की विभिन्न विधाओं के माध्यम से समाज, संस्कृति और राष्ट्र से जुड़े प्रश्नों को स्वर दिया। ‘जाग उठ मेरे हिंदुस्तान’ जैसी रचनाओं में उनकी जागरण चेतना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।

उन्होंने कहा कि रांगेय राघव ने साहित्यिक गुटबंदी से दूरी बनाए रखते हुए स्वतंत्र चिंतन को प्राथमिकता दी। भारतीय परंपरा और नाथपंथ से जुड़े साहित्य पर भी उनका महत्वपूर्ण लेखन रहा। उनका साहित्य आज भी नई पीढ़ी को सामाजिक सरोकार, आत्मचिंतन और राष्ट्रबोध की प्रेरणा देता है।

युवा ही राष्ट्र की चेतना के वाहक
पूर्व कुलपति एवं वरिष्ठ वक्ता प्रो. संजीत गुप्ता ने कहा कि रांगेय राघव और महाराजा सुहेलदेव की स्मृति केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत है। स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत की अपनी नीति, दृष्टि और लक्ष्य है।

आज की पीढ़ी को त्वरित परिणामों की प्रवृत्ति से बाहर निकलकर धैर्य, अध्ययन और चिंतन की दिशा में आगे बढ़ना होगा।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रनिर्माण केवल सरकार या संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है। प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करके राष्ट्रनिर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है।

भारतीय ज्ञान परंपरा को समझने का आह्वान
विभाग प्रचारक दीनानाथ ने कहा कि भारतीय इतिहास में समय-समय पर ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने समाज को जागृत करने का कार्य किया। रांगेय राघव ने भी अपनी रचनाओं के माध्यम से जनमानस में चेतना उत्पन्न करने का प्रयास किया। उन्होंने भारतीय जीवन-मूल्यों, स्वावलंबन और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को मजबूत करने की आवश्यकता पर बल दिया।

पुस्तक का हुआ विमोचन
संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रो. वंदना पाण्डेय ने की। उन्होंने साहित्य, मानविकी और विज्ञान को परस्पर पूरक बताते हुए ज्ञान के समग्र दृष्टिकोण को आवश्यक बताया। उन्होंने कहा कि अपनी सांस्कृतिक जड़ों और ज्ञान परंपरा को समझना समाज और राष्ट्र के भविष्य को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।

कार्यक्रम में रांगेय राघव शोधपीठ की पुस्तक का विमोचन भी किया गया। पुस्तक के संपादक प्रो. सुजीत कुमार श्रीवास्तव तथा सह-संपादक डॉ. मनीषा सिंह हैं। संगोष्ठी के संयोजक प्रो. सुजीत कुमार श्रीवास्तव ने आयोजन की रूपरेखा प्रस्तुत की। संचालन शुभम राय ने किया।

हरिऔध कला भवन में आयोजित सत्र में बड़ी संख्या में विद्यार्थी, शोधार्थी, शिक्षक और नागरिक मौजूद रहे। वक्ताओं ने कहा कि भारत के भविष्य को सशक्त बनाने के लिए युवा पीढ़ी को अपने इतिहास, संस्कृति, ज्ञान परंपरा और संवैधानिक दायित्वों के प्रति जागरूक एवं जिम्मेदार बनना होगा।

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